अहंकार की विदाई में ही संसार के सारे सुख समाए है |
जिंदगी और कुछ नहीं है बस हस्ते हुए अपने परिवार के साथ , दोस्तों के साथ और दुसमनो के भी साथ बिताते हुए बाल ,दाढ़ी और दिमाग भी थक जाता है परंतु यदि फिर भी जीने क मन करे तो वह और कुछ नहीं बस ज़िंदगी है |
इसलिए कल क्या होगा पता नहीं लेकिन सोच कर अच्छा लगता है की कल भी होगा | अहंकार की विदाई में ही संसार के सारे सुख समाए है जैसे की मैं एक हिस्ट्री में ले जाता हूँ | जिन विवेकानंद जी और स्वामी रामतीर्थ को सारी दुनिया में प्रशंसा मिली , उनको अपने ही देश में तवज्जो नहीं दी गई थी | और ये दोनों कहा करते थे की प्रशंसा का प्रमाण-पत्र लेना भी हो तो परमात्मा से लो , दुनिया क्या देगी |
लेकिन मनुष्य की सबसे बड़ी weak होती है अहंकार , और प्रशंसा अहंकार का भोजन है | अहंकारी व्यक्ति को लगता है सब जगह तारीफ हो , मेरी पूछ-परख हो | दुख का एक अदृश्य कारण अहंकार भी है | एक छोटा -सा प्रयोग करके देखिए |
मारकर पेन से भी कभी बर्फ के छोटे- से कागाज पर मैं लिखिए और थोरी देर देखिए | वह गल जाएगा , धूल जाएगा | एक प्रोयोग सांस का भी है | आखें बंद करे , भीतर से दोनों भौह के बीच में स्थित आज्ञा चक्र पर मैं शब्द को देखे और जब सांस छोड़े तो उसी “मैं” को गला दे | गलता हुआ देखे | इस क्रिया को तीन -चार बार करिए | आपको अनुभूत होगा की “मैं” गिर रहा है | “मैं” जैसे -जैसे जाएगा ,
अहंकार को भी लेता जाएगा | और की विदाई में दुनिया के सारे सुख समाए हैं |
